स्वाध्याय बढ़ेगा, अहम् गलेगा, विनम्रता का भाव बढ़ेगा: आचार्य सुदर्शन लाल जी

 

 जीवन में स्वाध्याय का कितना महत्व, इससे आप अपरिचित नहीं हैं। हमने मात्र आधा घंटा कोई पुस्तक पढ़ ली या इधर-उधर कुछ भी पढ़ लिया और सोच लिया कि ‘स्वाध्याय’ हो गया। बंधुओं!ऐसा नहीं है। पुस्तक पढ़ना तो अध्ययन है, उसे जीवन में उतारना स्वाध्याय है। कहीं हमने अध्ययन और स्वाध्याय को एक तो नहीं मान लिया? अध्ययन में प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती, जबकि स्वाध्याय में पढ़ा हुआ तत्व अनुभूति का विषय बन जाता है और अनुभूति के द्वारा ही आनंद की प्राप्ति होती है। मात्र अध्ययन से अहं -भाव में वृद्धि होती है, परंतु स्वाध्याय से अहं का त्याग होता है। इसीलिए प्रभु ने स्वाध्याय करने व एकांत-सेवन का संकेत किया है। जितना स्वाध्याय बढ़ेगा, उतना ही अहम् गलेगा और विनम्रता का भाव बढ़ेगा।
स्वाध्याय का अभिप्राय है स्व का अध्याय- अपने आप का अध्ययन। बाह्य ज्ञान, पर-ज्ञान है, उसे कितना भी प्राप्त करें, परंतु शाश्वत सुख रूपी लाभ उससे नहीं मिलता। बाह्य ज्ञान से विद्वता आ सकती है, व्यक्ति का पांडित्य बढ़ सकता है, बुद्धि की प्रखरता-तर्क प्रवणता भी बढ़ जाएगी, किंतु चारित्र की ऊष्मा नहीं बढ़ सकेगी। बाह्य ज्ञान सैद्धांतिक ज्ञान है, जबकि स्वाध्याय प्रयोगात्मक ज्ञान है-अनुभूति को प्रखर-पुष्ट करने वाला है। इससे साधना में तेजस्विता आती है, अंतःशोधन होता है एवं व्यक्ति का साधुत्व-सरल स्वभाव प्रकट होता है। स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान निज का ज्ञान बन जाता है।

(आचार्य श्री सुदर्शन लाल जी म. सा. के प्रवचन से उद्धृत)

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