विकारयुक्त विचार ही रोग है : आचार्य श्री सुदर्शनलाल जी म.सा.

समर्पण भाव ही प्रसन्नता का कारण

जहां द्वैत भाव, वहां समर्पण नहीं

जहां श्रद्धा एवं विश्वास है, वहां जीवन में हल्कापन है, सरलता है। आप जानते ही हैं कि भारी वस्तु ही डूबती है, हल्की नहीं। इसी भांति श्रद्धायुक्त आत्मा विभाओं से- दुष्ट-वृत्तियों से रहित होने के कारण हल्की होती है। अतः वह संसार में नहीं डूबती। वह संसार में तभी डूबती है, जब विकारों के भार से भारी बन गई हो। व्यक्ति जब श्रद्धा का भाव रखता है, तो भारीपन जीवन में नहीं आता। भारीपन आता है कषायों से, राग- द्वेषात्मक भावों से, कलुषित या विपरीत विचारधारा से। जब आत्मा विकारपूर्ण स्थितियां अपने पर लाद लेती है, तो अनेक प्रकार से भ्रांतिपूर्ण चिंतन बन जाता है और व्यक्ति का अहम् प्रबल हो जाता है। विकारयुक्त विचारों को ही रोग कहा गया है। अतः जब आत्मा कषाय रहित बन जाती है, तो स्वयं को हल्का महसूस करती है और हल्की या निर्भार बनी हुई आत्मा कभी भी नहीं डूबती।

मंदिर जाना, स्थानक में आना, समर्पण नहीं है। धर्म स्थान में जाकर माथा टेकना भी समर्पण नहीं है। समर्पण देह से नहीं, अपितु भावों से होना चाहिए। समर्पण भाव ही प्रसन्नता का कारण बनता है। समर्पण के भाव से ही व्यक्ति का कल्याण होता है। जहां समर्पण होता है, वहां द्वैत भाव नहीं होता। मैं और तू का भेद मिट जाता है। वह जीव तब ‘कोSहम्’ के उत्तर में ‘सोSहम्’ का जाप करता है। इस क्रम व्यक्ति कहने लगता है, ‘’तेरा तुझको सौंपता क्या लागे मोहि।‘’ इस प्रकार वह पदार्थ जगत से ऊपर उठकर आत्म जगत में रमण करने लगता है। जिधर भी वह देखता है सर्वत्र उसे परमात्मा रूप आत्मा की ही दिव्य छवि दिखाई देती है। ‘’लाली देखन मैं गई, हो मैं भी हो गई लाल’’ यानी समर्पण भाव के कारण आत्मा स्वयं परमात्मा बन जाती है, उसी रंग में रंग जाती है।

( आचार्य श्री सुदर्शनलाल जी म.सा. के प्रवचन का अंश)

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