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कब तक ‘बाहरी’ होने का झेलते रहेंगे दंश

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने को लेकर पक्ष-विपक्ष में ढेरों तर्क-कुतर्क गढ़े गये. सार्वभौमिक तर्क है कि एक देश, एक विधान. यह तर्क लोकतांत्रिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन क्या एक देश, एक विधान सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए हैं, देश के अन्य हिस्सों में ऐसा भेदभाव नहीं है. सवाल गंभीर और गहरे हैं. दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में सामुदायिक अस्मिता और पहचान के संरक्षण के लिए कुछ प्रावधान किये गये, लेकिन इन प्रावधानों का जितना उपयोग किया गया, ठीक उसके विपरीत इसका दुरपयोग भी किया गया.

देश के आदिवासी बहुल राज्यों के विकास के नाम पर 1995 में तीन राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन किया गया. यहां पांचवीं और छठीं अनुसूची के प्रावधान तथा राज्य में अनुच्छेद 170 लागू किये गये . इसके अनुसार इन राज्यों में आदिवासियों की जमीन कोई भी गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता तथा गैर आदिवासियों को यहां का स्थायी निवासी नहीं माना जाता. इन प्रावधानों को लेकर कैसे इन राज्यों में रहने वाले गैर आदिवासी समुदाय के लोग दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहने के लिए बाध्य है, मैं इसे खुद के द्वारा अनुभव किये गये दास्तां बयां करता हूं.

मैं स्वयं छत्तीसगढ़ के बस्तर का रहने वाला हूं. मेरी पांचवीं पीढ़ी इस क्षेत्र को समृद्ध करने और संवारने में लगी हुई है. पांच पीढ़ी पूर्व मेरे पूर्वज उत्तर प्रदेश से यहां के स्थानीय लोगों को उन्नत खेती के तौर-तरीके सिखाने के उद्देश्य से आएं और यहां बस गये. बस्तर में हमारी चार पीढ़ियां बीतने के बाद भी मैं मूलतः उत्तर प्रदेश का निवासी माना जाता हूं, जबकि मेरा जन्म बस्तर में हुआ तथा यहां की हवा पानी मेरे कतरे-कतरे में समाया हुआ है लेकिन मैं यहां का मूल निवासी नहीं माना जाता.

यहां स्थानीय समुदायों में जब भी राजनीति से प्रेरित स्थानीय तथा बाहरी का मुद्दा गर्माता है तो मुझे बलपूर्वक बाहरी वाले खांचे में फिट किया जाता है, जब भी छठीं अनुसूची लगाने की सुगबुगाहट शुरू होती है, तब यह अफवाह फिजां में तैरने लगती है कि इस अनुसूची लगते ही, बाहरी लोगों के मकानों तथा जमीनों पर अब स्थानीय आदिवासी कब्जा करने वाले हैं तथा उस लिस्ट में सैकड़ों साल से यहां रह रहे परिवारों का भी नाम भी होता है. तब बड़ी शिद्दत के साथ यह टीस उठती है कि, क्या मेरे पूर्वजों द्वारा बस्तर के लिए किया गया सारा त्याग, सेवा, बलिदान सब व्यर्थ गया. क्या हमने बस्तर को इन लोगों की तुलना में कम प्यार किया है? कश्मीर के पंडितों तथा गैर कश्मीरियों लोगों के लिए चिंतित देश की सरकार को क्या हम लोगों के बारे में नहीं सोचना चाहिए जोकि राजनीतिक संप्रभुता प्राप्त स्वतंत्र गणतंत्र के दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रह गए हैं. माना जाता है कि समानता का अधिकार एक तथ्य नहीं विवरण है. विवरण से तात्पर्य उन परिस्थितियों की व्याख्या से है जहां समानता का बर्ताव अपेक्षित है. समानता और समरूपता में अंतर है. यदि कहा जाय कि सभी व्यक्ति समान है तो संभव है कि समरूपता का ख़तरा पैदा हो जाय. ‘सभी व्यक्ति समान हैं’ की अपेक्षा ‘सभी व्यक्तियों से समान बर्ताव किया जाना चाहिेए’, समानता के अधिकार के क्रियान्वयन का आधार वाक्य है.

हमारा संविधान देश के हर नागरिक को देश के किसी भी कोने में बसने की आजादी देता है और किसी भी स्थान पर 6 महीने तक लगातार निवास करने पर उस स्थान का निवास प्रमाण पत्र भी देता है. 3 वर्ष अथवा 5 वर्ष अथवा प्राइमरी स्कूल अथवा मिडिल स्कूल तक कि शिक्षा उस क्षेत्र में प्राप्त करने पर उस क्षेत्र का स्थाई निवासी प्रमाण पत्र भी प्रदान करता है. पर क्या सच में ऐसी कोई आजादी हमें हासिल है? क्या वाकई संवैधानिक रूप से समानता सबकों प्राप्त है? समानता के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में दो महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया गया है- अवसर की समानता और प्रतिष्ठा की समानता. अवसर और प्रतिष्ठा की समानता का अर्थ है कि समाज के सभी वर्गों की इन आदर्शों तक पहुंच सुनिश्चित की जाय। एक वर्ग विभाजित समाज में बिना वाद योग्य कानून और संरक्षण मूलक भेदभाव के समानता के अधिकार की प्राप्ति संभव नहीं है. संरक्षण मूलक भेदभाव के तहत आरक्षण एक सकारात्मक कार्यवाही है. आरक्षण के तहत किसी पिछड़े और वंचित समूह को (जैसे- स्त्री, दलित, अश्वेत आदि) को विशेष रियायतें दी जाती हैं ताकि अतीत में उनके साथ जो अन्याय हुआ है उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके.

दरअसल, स्थितियां इससे मेल नहीं खातीं. वोट के नाम पर राजनीतिक पार्टियों ने भारतीय समाज को इतने खांचो में बांट दिया है कि अब सामाजिक समरसता, एकता और एकजुटता की बातें केवल राजनीतिक मंचों तक सिमट कर रह गई है. आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची लगाकर उन्हें इस देश के संविधान की मूल भावना के इतर ,हर स्तर पर सामाजिक समानता तथा जीवन यापन के समान अवसरों से ही परे ढकेल दिया है. कश्मीरी पंडितों तथा गैर कश्मीरियों के अधिकारों को लेकर आंसू बहाने वालों से मैं यह पूछना चाहूंगा कभी देश में जिन क्षेत्रों में पांचवीं व छठीं अनुसूची लागू कर वहां बसे हुए तथाकथित आदिवासियों से इतर अन्य समुदायों के लोगों के बारे में भी कभी सोचा है, जिनका जीवन इन प्रावधानों ने नारकीय बना दिया है. कई पीढ़ियां बीत जाने के बाद, अपना सर्वस्व वहां की धरती पर न्यौछावर करने के बाद भी इन प्रावधानों के तहत वहां का समाज उन्हें बाहरी का तमगा देता है, और वह घुट-घुट कर दोयम दर्जे के नागरिक का जीवन जीने को मजबूर है. दरअसल, इतिहास गवाह है कि, यह वह लोग हैं जिन्होंने उन क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाई, जन जागरूकता व राजनीतिक चेतना पैदा कर वहां के समुदाय को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया. वहां भवन, स्कूल और सड़कें बनाई, व्यवस्थाएं कायम की. आज जो कुछ भी वहां विकास के नाम पर हम पाते हैं, इन सब की नींव में यह वही लोग हैं जो इन कानूनों के अनुसार बाहर से आकर बसे हैं. जो कुछ भी उद्योग, रोजगार इन क्षेत्रों में शुरू किए गए ज्यादातर उद्यमी बाहर से आकर जोखिम उठाकर वहां रोजगार सृजन का कार्य प्रारंभ किया, क्या वे सब इस देश के बासिंदे नहीं थे?
अगर मान भी लें कि किसी समुदाय के पूर्वजों ने सदियों पहले कोई खता की. वास्तव में तत्कालीन परिस्थितियों में उन लोगों ने क्या और क्यों किया? कोई गलती की भी या नहीं. उसका कोई ठोस साक्ष्य नहीं है. क्या ऐसे समुदायों के वर्तमान वारिसों को सजा देकर उनके हक छीन कर हम क्षतिपूर्ति अदा करने को न्यायोचित करार दे सकते हैं? यह कौन सा समानता का अधिकार अथवा समता के अधिकार की मांग को पूरी करता है? यह बात ध्यान देने योग्य है कि आरक्षण और संरक्षण मूलक भेदभाव समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 (4) स्पष्ट करता है कि ‘अवसर की समानता’ के अधिकार को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है. दरअसल, यही वह उपबंध है,जिसमें असमानता पैदा करने तथा देश को बांटने के बीज निहित हैं.

आज पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में जनजातीय समुदाय के अलावा हर किसी को बाहरी तथा शोषक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. नमक के बदले चिरौंजी खरीदने की वो गढ़ी गई अतिरंजित कहानियां सुनाई जाती हैं जिनका कभी अस्तित्व ही नहीं था. अच्छे और बुरे लोग तो हर समाज में होते ही हैं पर किसी भी समुदाय अथवा समाज को समग्रता के साथ शोषक कहा जाए यह किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है.

म.प्र,छत्तीसगढ की धारा 170 तथा इसके अन्य उपबंधों के कारण आज जनजातीय समुदाय के जरूरतमंद लोग अपनी जमीनों को या तो बेच ही नहीं पाते, अथवा किसी तरह बेचने की सरकारी अनुमति प्राप्त कर भी लेते हैं तो उसका सही मूल्य उन्हें नहीं मिलता. चूंकि धारा 170 के प्रावधानों के तहत एक आदिवासी किसी अन्य आदिवासी को ही अपनी भूमि बेच सकता है, इसलिए इन्हीं के समुदाय के धनी अथवा प्रभावशाली लोगों ने औने-पौने कीमत में इन जमीनों को खरीदते हैं, भले उस जमीन का 5 गुना मूल्य गैर आदिवासी दे रहा हो, लेकिन जरूरतमंद आदिवासी अपनी जमीन को अपने मनपसंद मूल्य पर अपने मनपसंद ग्राहक को चाहते हुए भी नहीं बेच सकता. इस प्रकार आदिवासियों के भी अधिकारों तथा हितों का हनन हो रहा है, लेकिन इस पीड़ा से इस समुदाय के धनी प्रभावशाली तथा राजनीतिक ताकत प्राप्त वर्ग को कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, जब इन संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन के लिए आवाज उठती तब इन्हीं वर्गों द्वारा इसका पुरजोर विरोध किया जाता है, एक प्रकार से कहा जाए तो आदिवासी समुदाय के संपन्न औऱ प्रभावशाली लोग ही अपने स्वार्थ के कारण इन प्रावधानों को हटाये जाने का विरोध करते हैं, जबकि आम आदिवासियों को इससे लाभ के अनुपात में नुकसान कहीं ज्यादा है.स्थानीय राजनीतिक दल भी अपनी वोट बैंक वाली राजनीति को तरजीह देते हुए, इस मुद्दे पर आर-पार का कोई रुख अख्तियार नहीं कर पाते और पांचवी – छठवीं अनुसूची के इन्हीं आदिवासियों के कल्याण के नाम पर इसका समर्थन करते हैं, जब कि जमीनी हकीकत इससे कहीं अलग है. आम आदिवासियों का बीते 7 दशकों में जिस स्तर पर विकास होना चाहिए था, वैसा विकास नहीं हुआ. जबकि बीते कई पीढ़ियों से यहां आकर बसे लोग अपनी मेहनत और कुशाग्रता से इन प्रदेशों को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, बावजूद इसके इन पर ‘बाहरी’ होने का टैग लगा हुआ है.

इसी तरह एक और वाकया मैं यहां आपसे साझा करना चाहता हूं. दरअसल, जब मैं दरभा विकासखंड के छिंदबहार माध्यमिक स्कूल में पढ़ता तब दरभा विकास प्रखंड से एक अधिकारी स्कूल में आकर हर बच्चों को छात्रवृचि के तौर पर करारे-करारे नोट दिया करते थे, लेकिन विद्यालय में मैं ही एक ऐसा छात्र था, जिसे वह छात्रवृति की रकम नहीं मिलती थी. मेरे बालमन में यह लगातार सवाल उठता था कि मैं पढ़ने, खेल-कूद इत्यादि सभी क्षेत्र में अपनी कक्षा के अन्य छात्रों से किसी भी मामले में कमतर नहीं हूं, लेकिन मुझे पैसे क्यों नहीं मिलते. उस जमाने में शिक्षक से छात्र काफी डरते थे, स्वाभाविक था यह प्रश्न मेरे मन में घुमड़ तो रहे थे, लेकिन शिक्षक से पूछने की हिम्मत नहीं थी. लेकिन इसका उत्तर मेरे लिए जरुरी था. मैंने अपने दादा जी से पूछा तब उन्होंने बताया कि छात्रवृति की राशि इस लिए तुम्हें नहीं मिलती क्यों कि तुम आदिवासी नहीं हो और तुम्हारे नाम के अंत में लगा सरनेम यह बताता है. मेरे बालमन ने तुरंत निर्णय लिया कि अब अपना सरनेम का उपयोग नहीं करेंगे. और मैं अपना नाम बगैर सरनेम का लिखने लगा. इस पर अचानक एक दिन मेरे शिक्षक का ध्यान गया. उन्होंने डपटते हुए पूछा- तुम अपना पूरा नाम क्यों नहीं लिखते. मैंने बताया कि मेरे सरनेम की वजह से छात्रवृति की राशि मुझे नहीं मिलती, इसलिए मैंने अपना सरनेम हटा दिया. शिक्षक ने मेरी भावनाओं को समझने के बजाय मुझे जालसाज तक करार दे दिया. यह वाकया बताता है कि गैरआदिवासियों को इसी प्रकार कई तरह की भावनात्मक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है. अंत में यह बात पूरी मजबूती के साथ कहते हुए, यह तथ्य रेखांकित करना चाहूंगा कि इस भेदभाव के मूल में इन क्षेत्रों के मूल आदिवासी बिल्कुल भी नहीं हैं, वह बेचारे तो सीधे-साधे सरल लोग हैं जो हर एक को गले लगाते हैं, अन्य क्षेत्रों से आई हुई कौमों को उन्होंने सदैव दिल से अपनाया है तथा उनकी हमेशा सहायता की है । हकीकत तो यही है कि यह आदिवासी मूलवासी, इस कुटिल राजनीति को बिल्कुल ही नहीं समझते, उनका तो मूल स्वभाव है अपने में मस्त रहना तथा अनावश्यक विवादों से दूर रहना, वास्तव में इनकी जड़ों में, वोट तथा सत्ता के वह दलाल हैं जो कि इनकी भावनाओं को भड़का कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं अगर इन प्रावधानों से आदिवासियों का भला होना होता तो इन 70 सालों में इन क्षेत्रों के बहुसंख्यक समुदायों की तस्वीर और तकदीर बदल चुकी होती, पर हकीकत में ऐसा हुआ नहीं, इन प्रावधानों का लाभ मुट्ठी भर लोगों ने जी भर के उठाया, बारंबार , लगातार उठाया और यही वो तत्त्व हैं, जो कि आज भी स्थानीय तथा बाहरी के मुद्दे पर वहां के लोगों को लोगों को लड़ा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। अतएव अब वक्त आ गया है कि उपरोक्त प्रावधानों की पुनः समग्रता के साथ समीक्षा की जाए.

(लेखक डॉ. राजाराम त्रिपाठी अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) के राष्ट्रीय संयोजक हैं)

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