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मतभेद बनाम मनभेद

मतभेद और मनभेद दो ऐसे शब्द हैं, जिनकी आवाज में भले एकरूपता का आभास होता है, लेकिन परिणाम में ये बिल्कुल एक दूसरे के प्रतिकूल हैं। किसी के प्रति हमारा वैचारिक अंतर मतभेद कहलाता है। जिसकी वजह से हम उसके विचारों के अतिरिक्त उसके हर निर्णय व तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं। विचारों का अलग-अलग होना एक सामान्य है बात है। इससे नयी बात और नये विचार सामने आते हैं। साथ ही उत्तरोत्तर विकास के लिए यह जरूरी भी है। क्योंकि विचारों पर वाद एवं प्रतिवाद की प्रक्रिया में उचित और उपयोगी निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। व्यक्ति को भूलों का पुतला कहा गया है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में परिपूर्ण नहीं होता है। ऐसे में किसी एक व्यक्ति के विचारों को भी सर्वकालिक और सर्वमान्य कैसे माना जा सकता है। किसी भी विचार पर मत भिन्नता किसी ना किसी वजह से ही उत्पन्न होती है। मत-भिन्नता की वजह ही एक नये नजरिये को लेकर उपस्थित होती है। मन में अपार भावनाएँ, वृतियाँ, रुचियाँ होती हैं जो सबकी व्यक्तिगत होती हैं। व्यक्तिगत गुण परिवार और समाज की स्थिति और परिवेश से काफी प्रभावित होते हुए विकसित होते हैं। अलग-अलग स्थिति और परिवेश से आने वालों के व्यक्तिगत स्वभाव में भिन्नता को स्पष्ट देखा जा सकता है।

मतभेत के उलट मनभेद में किसी के प्रति हृदय से घृणा की प्रवृति दिखाई देती है। जिसके कारण सामने वाले की कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती है। किसी ने सच ही कहा है कि बुराई की आंख से अच्छाई नहीं देखी जा सकती है। मनभेद दिलों में परस्पर के प्रति पूर्वाग्रह के कारण भी उपजता है। दिलों की दूरी जीवन के सफर में अवरोधक का काम करती है। यह विनाश को आमंत्रित करती है। पूर्वाग्रह को किसी भी रूप में अपने दिलो दिमाग में जगह बनाने का अवसर नहीं देना चाहिए। आपकी नजर में भले ही कोई कितना भी गलत करता आ रहा हो, लेकिन उसकी आलोचना वस्तुनिष्ठ होकर ही करनी चाहिए। हो सकता है, वो इस बार गलत नहीं हो। मनभेद से बचने की कोशिश एक तरह से लगातार सीखने और अपने को और बेहतर बनाने की एक प्रक्रिया है। मनभेद की शुरुआत तभी होती है, जब हम तथ्य के बजाय व्यक्ति को पहली प्राथमिकता दे देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपने किसी विरोधी की तथ्यपरक आलोचना को भी विरोध की मानसिकता ठहरा देते हैं। इस क्रम कोई अपने अहंकार को तो भले तुष्ट कर ले, लेकिन सच्चाई यह है कि वो इससे अपनी गलतियों को समझने और उससे बचने का एक सुनहरा अवसर खो चुका रहता है। महान से महान ज्ञानी व्यक्ति का भी कोई विचार गलत हो सकता है। इसलिए कभी भी अहम् में इतना अँधा नहीं होना चाहिए कि जो हमारा समर्थन करे वे हमें हमारे दोस्त और जो विरोध करे, वे हमें हमारे दुश्मन नज़र आने लगे। सोचना खुद को पड़ेगा कि क्या आप अपने आस-पास चाटुकारों की मंडली सजाकर कुपमंडूप रहना चाहते हैं या विचारों के खुले आकाश में उदारता का पंछी बनकर उड़ना पसंद करते हैं। अगर कोई विचार सचमुच अच्छा है और ग्रहण करने योग्य है तो उसका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए। अपने नजरियें में सुधार की गुंजाइश को अहंकार की दीवार से बंद करने के बजाय तथ्यात्मक आलोचना को स्वीकार करने की उदारता हमेशा बनाये रखनी चाहिए।

मनमोहन गुप्ता

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