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आईसीयू में ‘इंद्रावती’ और एक नदी की मौत के मायने

“पृथ्वी दिवस” पर विशेष लेख:

मिनी नियाग्रा के नाम से प्रसिद्ध बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात अंततः सूख गया, एक सप्ताह तक एक बूंद पानी नहीं,। क्षेत्र के पुराने जानकारों का कहना है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

इस नीले ग्रह में मानव समाज को बचाना है तो हमें अपने नदी, नालों को युद्ध स्तर पर पुनर्जीवित करना होगा तथा बचे खुचे ताल, तलैया , पोखरों, कुंआ बावलियों की सुध लेनी होगी।

आखिरकार चित्रकोट जलप्रपात पूरी तरह सूख ही गया। सुबह का अखबार पढ़ते,इस खबर पर नजर अटकी,मानो बिजली का झटका लगा हो, मन मस्तिष्क कुछ समय के लिए मानो जड़ हो गया । चुनावी समाचारों, घनघोर बयानबाजियों के न घटाटोप के बीच किसी आंचलिक खबरों के आंचल में, बहुत बड़ी दुर्घटना की आनुपातिक रूप से इक छोटी सी खबर छपी थी, कि बस्तर की इंद्रावती नदी का चित्रकोट जलप्रपात, जिसके एशिया का सबसे बड़ा जलप्रपात होने, मिनी नियाग्रा होने के सरकारी दावे किए जाते है, जिसे बस्तर के आदिवासी चीतरकोट अथवा घूमर के नाम से जानते हैं,, इस अप्रैल के शुरुआत में ही पूरी तरह सूख गया, यानी कि वहां पर बस्तर की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी भी पूरी तरह सूख गई , जलप्रवाह अवरूद्ध हो गया है। एक हफ्ते से इस जलप्रपात में एक बूंद पानी नहीं है। लगा कहीं यह खबर अतिरंजित तो नहीं, आखिर मन नहीं माना तो जाकर देखा, सचमुच इंद्रावती नदी वहां पूरी तरह सूख गई थी, और उसी के साथ अनवरत हरहराने वाला वह जलप्रपात भी ,जिसकी आवाज मीलों दूर से गूंजते रहती थी,जिसे स्थानीय आदिवासी घूमर तथा चीतरकोट कहते थे, वह सचमुच खामोश हो चला है। नदी की तलहटी की चट्टानें नंगी पड़ी तप रही थी । बड़ा ही खौफनाक मंजर था।

पिछले दशकों में सरकारों ने इस ऐतिहासिक जलप्रपात चित्रकोट को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की कोशिश की है । प्रकृति प्रेमी पर्यटक समूहों में आज भी पिकनिक मनाने आए हुए थे । ऊपर पानी कहीं भी नहीं है, जलप्रपात मर गया है, नदी मरी हुई पसरी पड़ी है,, पर उससे किसी को क्या फर्क पड़ता है,,? जलप्रपात के नीचे जो ठहरा हुआ जल है सब उसमें नहा रहे हैं, जलक्रीड़ा कर रहे हैं तथा आनंद मना रहे हैं, जश्न मना रहे हैं। हम कितने संवेदनाहीन, कृतघ्न और बेशर्म हो गए हैं । इस अनादि काल से बहने वाली , मानव जाति अनगिनत आवश्यकताओं की अनवरत पूर्ति करने वाली, बस्तर की जीवनरेखा मानी जाने वाली इस इंद्रावती नदी की मौत, तथा इसके इस जलप्रपात के अवसान का किसी को रत्ती भर गम नहीं है।

कल अगर यह जल भी समाप्त हो जाए तो किसी को क्या फर्क पड़ता है, पिकनिक के लिए कोई और दूसरी जगह तलाश लेंगे। अब हम खबर पर आते हैं क्या इंद्रावती नदी का सूख जाना ,जलप्रपात का मर जाना, क्या यह सचमुच दुर्घटना है?? बिल्कुल नहीं हमने अन्य नदियों की तरह ही इंद्रावती को भी तिल तिल कर के मारा है। यह दुर्घटना कतई नहीं है,, सीधे तौर पर यह हमारे अंतहीन लालच के हाथों एक और नदी का कत्ल है। छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा दोनों राज्यों ने इसकी पानी को 50% – 50% उपयोग करने का अनुबंध कर लिया फिर अनुबंध में बेईमानी का एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे, राजनीतिक खेल चलते रहे। इस पर बिना दूरगामी परिणामों के समुचित आकलन के बड़े बांध तथा एनीकिट बनाए गए, नदी को सतत जलआपूर्ति करने वाली सहयोगी छोटी नदियों तथा नालो को स्टापडैम के द्वारा अवरूद्ध कर दिया गया, इसके प्राकृतिक मार्ग को बदलने की परिस्थितियां निर्मित की गई, तटीय घने जंगल काट डाले गए,इसकी रेत का अंधाधुंध दोहन किया और अंततः इसे मरने के लिए छोड़ दिया। हम यह भूल गये कि लगभग 250 गांवों की खेती तथा उनका जीवन 390 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इसी नदी पर पूरी तरह निर्भर है। इस बीच कुछ प्रकृति प्रेमी संगठनों तथा समाचार पत्रों की गुहार पर प्रशासन ने इंद्रावती नदी पर बनाए गए एनीकिट से कुछ पानी छोड़ कर इस जलप्रपात को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया है यह उसी तरह है जिस तरह आईसीयू में मृत्यु शैया पर पड़े बीमार को ऑक्सीजन देकर जीवित रखने का प्रयास किया जाए। पर इस से काम चलने वाला नहीं है हमें इसके स्थाई हल ढूंढने होंगे।

हम सबको मिलकर हर कीमत पर इंद्रावती को बचाना तथा इसके गत गौरव को वापस लाना ही होगा। और यह भी ध्यान रहे कि यह सब हम कोई इंद्रावती नदी अथवा चित्रकूट जलप्रपात को बचाने के लिए नहीं कर रहे हैं यह तो हम अपने तथा अपनी आने वाली पीढ़ियों के जीवन की सुरक्षा को गारंटी के लिए कर रहे हैं, जो कि बिना प्रकृति के संरक्षण के संभव नहीं है। दरअसल प्रकृति के प्रति हमारी संवेदनाएं भी इंद्रावती की भांति ही सूख गई है। दरअसल हमें इस धरती के इन खूबसूरत पेड़-पौधे जीव-जंतु ,झरने नदियों के साथ जीने का सलीका आया ही नहीं। इन्हें कब्जाने तथा इनका अधिकाधिक दोहन करने की होड़ में हमने सब कुछ नष्ट भ्रष्ट कर दिया। यू खानापूर्ति के लिए हर वर्ष हम पृथ्वी दिवस तथा पर्यावरण दिवस जैसे कुछ आयोजन करके दिखावटी रस्म अदायगी तो करते हैं , लेकिन जमीनी हकीकत तो यही है कि, हमने इस नीले ग्रह को अपने लालच के कारण स्वर्ग से नरक में बदल डाला है। हमारे भूगर्भ स्थित जल की मात्रा के 2 दिन घटती जा रही है सन 2050 तक पीने योग्य जल का भारी संकट उत्पन्न होने की संभावना है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई तथा घटते हुए वालों ने ग्लोबल वार्मिंग नामक दावानल को जगा दिया है यह दावानल अगर इसी तरह से आगे बढ़ता रहा तो पूरी सृष्टि को कयामत की आग में झोंक देगा। मनुष्य ने विकास के नाम पर जल थल तथा नभ तीनों को भारी मात्रा में प्रदूषित किया है। भूगोल के नीचे का भी अधिकांश जल प्रदूषित हो चला है संसद में पेश एक जानकारी के अनुसार भारत की एक तिहाई जिलों का जल इसमें घुली फ्लोरीन, आयरन तथा आर्सेनिक की जहरीली मात्रा के कारण पीने योग्य नहीं है। प्रदूषण के कारण प्राण वायु भी विषैली हो गई है। कुल मिलाकर मानव जाति अपने ही कर्मों के कारण विनाश के कगार पर खड़ी है यदि आप भी नहीं चेती तो इस ग्रह से मनुष्य नामक प्रजाति का विकास होना अवश्यंभावी प्रतीत होता है। *इस नीले ग्रह में मानव समाज को बचाना है तो हम सब को मिल कर इसे फिर से हरित ग्रह में बदलना होगा। प्राथमिकता के आधार पर अपनी नदियों को, नालों को युद्ध स्तर पर भिड़ कर पुनर्जीवित करना होगा। अपने बचे खुचे ताल, तलैया , पोखरों, कुंआ बावलियों की सुध लेनी होगी।सही मायने में तभी हमारा पृथ्वी दिवस मनाना सार्थक हो सकेगा।

प्रकृति को बिना स्थाई नुकसान पहुंचाए उनके साथ सहजीवन की विधा सीखना आज के सभ्य समाज के लिए अब बेहद जरूरी हो गया है ,,ऑक्सीजन की तरह,, हवा पानी भोजन की तरह। यह जीवन विद्या हम सीख सकते हैं अपने उन कुछ बचे खुचे वनवासी आदिम जनजातियों से जहां हमारी सर्वग्रासी सभ्यता तथा विकास के श्रीचरण अभी ना पड़े हो,, जिन्होंने सदियों सदियों से पेड़ पौधों जीव जंतुओं, नदी झरनों, जंगल पहाड़ों के साथ बिना उन्हें विनष्ट किए,स्वस्थ सुखी संतुलित जीवन जीने का मंत्र साध लिया है। अभी तो हमें उस दिन का बेसब्री से इंतजार रहेगा जब मानसून में फिर भरपूर वर्षा होगी, जल का समुचित प्रबंधन हो पाएगा और इंद्रावती एक बार फिर से जलसंपन्न होकर अपने गत उदृदाम यौवन को पुनः प्राप्त करेंगी तथा बस्तर के नियाग्रा चित्रकोट की घूमर गर्जना एक बार से फिर चहुं दिस गूंज उठेगी।

डॉ. राजाराम त्रिपाठी राष्ट्रीय समन्वयक, अखिल भारतीय किसान महासंघ आइफा

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