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भागवत वेद रूपी पेड़ का पका हुआ फल है : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है
मुंबई। भाईंदर पूर्व के बाला साहेब ठाकरे मैदान में हो रही श्रीमद् भागवत कथा में विश्व प्रसिद्ध भागवत कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि वेद रूपी पेड़ का भागवत पका हुआ फल है । पके हुए फल की तीन प्रमुख पहचान हैं, पहली पहचान वह नर्म हो जाता है, दूसरी पहचान वो मीठा हो जाता है और तीसरा वो अपना रंग बदल लेता है। भक्ति में परिपक्व, भक्ति में निपुण जो जीव है उसकी भी ये तीन विशेषतायें हैं। जब जीव भक्ति में आगे बढ़ने लगता है तो सबसे पहला गुण वो विनम्र हो जाता है, आप जीवन में सफल हों या न हों, लेकिन आपके जीवन में विनम्रता होनी ही चाहिए। झुका हुआ व्यक्ति, विनम्र व्यक्ति जीवन में कभी भी मात नहीं खा सकता। दूसरा उसकी वाणी मीठी हो जाती है, उसकी वाणी में कटुता नहीं होती, आप अपने ऊपर सोचिए कि आपकी वाणी कैसी है ? कौए और कोयल का रंग एक जैसा होता है, लेकिन कौए से सब नफरत करते हैं और कोयल मधुर बोल के कारण प्रिय लगती है। इसलिए मीठा बोलिए। तीसरा भक्ति में निपुण व्यक्ति के चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है, जो भगवान की भक्ति करते हैं वो अपने आप को अविश्वासी नहीं बनने देते, पूर्ण विश्वास करते हैं कि इसमें उन्हें सफलता निश्चित मिलेगी। उन्होंने आगे कहा कि जीवन में गुरूर नहीं गुरू की जरूरत है और गुरू ऐसे नहीं की कंठी ले ली और फिर झांके ही नहीं। ये सत्संग होता ही इसीलिए है कि यहां सुनो, गुनो और आगे बढ़ो।

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित इस भागवत कथा में महाराज श्री ने कहा कि भगवान हमें कभी वेद के माध्यम से, वेद की श्रुतियों के माध्यम से, पुराणों के माध्यम से तथा गुरू और संतों की वाणी के माध्यम से बार- बार समझाते ही हैं, ना समझ तो हम हैं कि सुनने और समझने के बाद भी गलतियां करने से बाज नहीं आते। ऐसा नहीं है कि ईश्वर हमें समाझाते नहीं है, ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने हमें समझने का अवसर नहीं दिया, जब भी आप कथा में इस बात से सहमत होते हो कि ये सच है, ईश्वर ने आपके गुरू के द्वारा, संतों के द्वारा वो बात आप तक पहुंचाई ही है। आप कथा पंडाल में सहमत होते हैं और बाहर जाते ही वहीं करते हो जिसके लिए पंडाल में सहमति दी थी कि ये मेरी भूल है, यही माया का सच। ईश्वर हमें बार- बार कहते हैं अपना ध्यान रखो, गलत दिशा में मत जाओ लेकिन ये पापी मन है कि मानने का नाम ही नहीं लेता।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भागवत कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कहा कि श्रीकृष्ण दुखी है कि इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है, हमारे यहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई कि कौन जाएगा, तो बोले कि शुक जी जा सकते हैं। शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता, जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा कि जाओ पहले यह देखकर आओ कि कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है । क्योंकि यह कथा सबको नसीब नहीं है। माता पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा कि श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानी कि माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारों ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

अश्वनी राय

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One comment

  1. ANIL KUMAR CHATURVEDI

    राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे 🙏

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