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पश्चाताप पुण्य का कारण बन जाता हैः आचार्य सुदर्शनलाल जी म.सा.

अद्भुत चातुर्मास मुंबई
संवत्सरी पर्व पर अपने चातुर्मास स्थल बोरीवली पश्चिम के वृंदावन वाटिका में व्याख्यान देते आचार्य श्री सुदर्शन लाल जी म.सा. ने कहा  कि वर्ष का अंतिम दिन संवत्सरी है। जब काल, वातावरण और प्रकृति में बदलाव आता है। नई स्थितियों में नयापन का दिन संवत्सरी है। बदली हुई प्रकृति में सब कुछ हरे-भरे मिलते हैं। परिवर्तन के दिन का नाम है संवत्सरी। परिवर्तन विकारों से सही क्रियाओं में आने का, अंधकार से प्रकाश में आने का और अच्छाई के लिए निरंतर सोचने के संकल्प का। सोचना आज के दिन भी परिवर्तन नहीं हुआ, तो आखिर कब होगा ? किस मजबूरी में बढ़ चुके हैं। पुराने पापों को ना करने और नए अच्छे कार्य करने के भाव जाग जाए, यही संवत्सरी की सार्थकता है। हम गलती को गलत नहीं मानते, इसलिए इससे मुक्त नहीं हो पाते। पुरानी गलतियों से मुक्ति और नया शुरू करने के लिए संकल्प की ताकत चाहिए। संवत्सरी अपने जीवन में एक साल के पाप या पुण्य के हिसाब का दिन है। यह भेदभाव को भूलकर क्षमा में आगे बढ़ने के हिसाब और संकल्प का दिन होता है।

ख्याल रखना, जिन शासन में पैसे से ज्यादा पवित्रता का मूल्य है। पद और भोगों के पीछे पवित्रता कहीं चली ना जाएं। समाज में अपवित्र लोग पैसे के बल पर सम्माननीय ना हो जाएं। पवित्रता से ही समाज की उन्नत होगी। पैसा और वैभव की वरीयता वाला समाज पतित हो जाता है। परिग्रह शरीर चलाने के लिए है जबकि पवित्रता अपनी शांति, संतुष्टि और समाधि के लिए जरूरी है। पवित्रता सुरक्षित ना रख पाने वाला अपनी नजरों से गिर जाता है। घर की पवित्रता को सोचना। अच्छे संस्कार जाने नहीं चाहिए। आपके चरित्र की छाप आपके बच्चों पर आएगी ही।

जानबूझकर किये गये पाप का प्रायश्चित नहीं होता। सबसे बड़ी बात है अपनी पवित्रता। परिवार और समाज से क्यों लड़ना ? हम तो महावीर के अनुयायी हैं। खानपान-रहन सहन में पवित्रता को बनाए रखना। आपका स्टेटस बढ़े ना बढ़े, परंतु अपनी पवित्रता बढ़ाते रहना। सोचना कोई ऐसा भाई-बंधु तो नहीं, जिससे मेरी बोलचाल नहीं है। क्षमा की संस्कृति में बैर को ढोना सही नहीं। हमारी संस्कृति क्षमा लेने और उदारता से क्षमा देने की है। अंतर के पाप और बैर भाव को मिटा दो। पश्चाताप पुण्य का कारण बन जाता है। हम दिखाते क्या है और होते क्या है ? यह दोहरा जीवन कब तक चलेगा ?

आचार्य श्री ने कहा कि गुरुदेव ने चतुर्विद संघ का नेतृत्व मुझे जिस लायक समझकर सौंपा, क्या उस लायक हो पाऊंगा ? क्या हम उस साधना के मुकाम तक पहुंच पाएंगे ? हम गुरुदेव से आशीर्वाद मांगते हैं कि दिखावे में खुद को कहीं खो ना दें। मैं अपने अंतःकरण से समस्त मुनियों, साध्वी समाज और सभी श्रावक-श्राविकाओं से जाने अनजाने में हुई किसी भी प्रतिकूलता के लिए क्षमा याचना करता हूं।

श्री प्राज्ञ जैन संघ मुंबई के अध्यक्ष ललित डांगी ने कहा कि मनुष्य जीवन और आर्य क्षेत्र मिलना सौभाग्य की बात है। लेकिन जैन समाज और नानक वंश में पैदा होना परम सौभाग्य की बात है। सांसारिक व्यवस्था में स्वभाविक रूप से बुरे कर्म आत्मा के साथ लग जाते हैं। हमारे धर्म में ही आत्मावलोकन के लिए संवत्सरी पर्व का विधान है। इसमें हर जैन अपनी आत्मा में रमण करके आत्मोन्नति का प्रयास करता है। मुनियों सहित गुरुदेव एवं साध्वीवृंद ने हमारी विनती पर काफी दुर्गम विहार करके मुंबई में चातुर्मास किया। मैं मुंबई संघ का अध्यक्ष होने के नाते समस्त मुंबई समाज व अपनी तरफ से हृदय की गहराइयों से नतमस्तक होकर इन चरित्र आत्माओं से अपनी किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगता हूं। उन्होंने मुंबई चातुर्मास समिति के सभी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं से भी क्षमा याचना की।

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