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 ‘ दे दे प्यार दे ‘ हाथ आए हीरे को न पहचानने का नजारा

अश्वनी राय

स्टारः 3

अजय देवगन, तब्बू और रकुल प्रीत सिंह की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘ दे दे प्यार दे ‘ का टाइटल सुनने में भले ही टपोरियों की भाषा लगे, लेकिन विषयवस्तु के स्तर पर यह बहुत ही संजीदगी लिए हुए है। फिल्म की शुरुआत तो किसी सेक्स कॉमेडी फिल्म जैसी होती है, लेकिन बड़ी तेजी से फिल्म दर्शकों को अपनी पकड़ में ले लेती है । मौज मस्ती के हल्के-फुल्के अंदाज में आगे बढ़ती फिल्म आशीष (अजय देवगन) और आएशा (रकुल प्रीत सिंह) के प्यार की बढ़ती संवेदनशीलता दर्शकों की संवेदना से तादात्म्य स्थापित कर लेती ही । लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म का जादू कम होने लगता है।

कहानी के विकासक्रम को लेकर फिल्म के लेखक और निर्देशक कंफ्यूज के शिकार से लगते हैं और एक नई सोच का पैमाना गढ़ती फिल्म लपेट कर खत्म कर दी जाती है। वास्तव में यदि फिल्म पहले हाफ की रवानी और नवीनता बरकरार रख पाती तो इस साल की कुछ खास रचनात्मक फिल्मों में यह स्थान बना लेती। फिल्म के मध्य भाग में समस्याओं की आंधी के बीच नायक की कश्मकश के पारंपरिक फार्मूले में पति की कलाई पर पत्नी से राखी बंधवाने के दिमागी फितूर का प्रदर्शन भी कर दिया गया है।

निर्देशक अकिव अली के पास एक तरफ अजय देवगन और तब्बू जैसे बेमिसाल कलाकार थे , तो दूसरी तरफ बेहद आकर्षक विषय। लेकिन अफसोस कि इन दोनों का दोहन कर वे लाभ उठाने से चूक गये हैं। कह सकते हैं निर्देशक हाथ में आये हीरे की परख नहीं कर पाए।

कहानी अपनी बीवी और दो बच्चों को छोड़कर लंदन में रहने वाले 50वर्षीय अमीर व्यक्ति आशीष के इर्द-गिर्द घुमती है, जिसे एक 26 साल की लड़की आएशा से प्यार हो जाता है। आशीष अपने हाल-ए-दिल के लिए काउंसलर की मदद लेता है, जहां काउंसलर उसके प्यार को रुमानियत का नाम देता है और उसकी संपत्ति को लड़की के प्यार का मंजिल बताता है। लेकिन अंततः आशीष अपने दिल की सुन आएशा को बीवी बनाने का फैसला कर उसे अपने बीवी-बच्चों से मिलाने के लिए इंडिया लेकर आता है। अपने घर आते ही उसे सारी परिस्थितियां उम्मीद के प्रतिकूल दिखती हैं। यहां आशीष की बेटी के शादी के लिए लड़के वाले आने को रहते हैं । अब आशीष को एडजस्ट करने की समस्या खड़ी है और इसी का तर्क संगत रास्ता ढूंढ़ने में फिल्म की ईमानदारी कहीं खो गई सी लगती है।  एक समस्या आएशा के परिचय की भी है। क्योंकि आशीष उसे अपना सेक्रेटरी बताता है। आगे इन दो पाटों को सही से पाटने की आशीष की कोशिशों को दिखाया गया है।

अभिनय की बात करें तो अजय देवगन ने एक युवती के अधेड़ प्रेमी को लाजवाब तरीके से पर्दे पर साकार किया है। अजय देवगन ने अपने किरदार को ईमानदारी और पवित्रता के सांचे में ढाल दिया है। तब्बू हमेशा की तरह यहां भी दमदार लगी हैं और पूरी सहानुभूति बटोर ले जाती लगती हैं, तो चहकती सी रकुल प्रीत सिंह ने मस्ती का रंग और गाढ़ा कर दिया है।छोटे-छोटे दृश्यों में जावेद जाफरी और जिमी शेरगिल भी फिल्म को गति दे गये हैं। किसी पात्र की मानसिकता को उसी के संवादों से बांधने का सफल प्रयोग ‘दे दे प्यार दे’ में अपनाया गया है। फिल्म के कुछ गाने मनोरंजक हैं।

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