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फिर धोखे के शिकार हो रहे हैं किसान

डॉ. राजाराम त्रिपाठी 

# देश की घटती हुई विकास दर तथा दिन प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी, आईसीयू में पड़ी खेती तथा आत्महत्या कर रहे किसान, अब नहीं रहे चुनावी मुद्दे.

# देश का समग्र विकास तथा राम मंदिर जैसे टिकाऊ मुद्दे कब और कहां दफन हो गए पता नहीं चल रहा.

# गरीबी-विकास, राम-रोटी-रोजगार, मंदिर-मस्जिद, हिंदू -मुस्लिम, सवर्ण- दलित, दलित-अति दलित, पिछड़ा- अतिपिछड़ा, अनुदान-आरक्षण जैसे मुद्दे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सीटों की वोटों के गणित के आधार पर ताश के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे.

# राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र एक प्रकार से बिना जोखिम के पोस्ट डेटेड चेक की तरह ही होते है जो अक्सर बाउंस हो जाते हैं, और ऐसे फर्जी चेक जारीकर्ता के लिए किसी सजा का प्रावधान भी नहीं है.

# प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी सभा में अपनी जाति बताकर, सजातीय मतदाताओं से अपनी पार्टी के लिए वोट मांगना देशवासियों को निराश करता है.

किसानों की किस्मत में राजनीतिक दलों की ओर से धोखा मिलना ही शायद नियति बन गई है. कांग्रेस और भाजपा ने जिस प्रकार अपने-अपने घोषणा पत्रों में किसानों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया उससे लगा कि अब राजनीतिक दल किसानों के प्रति संजीदा हो गये हैं, लेकिन चार चरणों के मतदान होते-होते किसानों के मुद्दे चुनाव प्रचार से गयाब हो गये हैं और किसान खुद को फिर से ठगा महसूस करने लगे हैं.

लोकतंत्र का महापर्व- आम चुनाव. वर्ष 2019 के आम चुनाव के लिए चार चरण के मतदान भारी गर्मी और गर्म माहौल के बीच पूरे हुए और इस प्रकार देश की कुल 543 में अब तक 375 सीटों पर मतदान की प्रक्रिया पूरी हो गई है और शेष तीन चरणों में 168 सीटों पर मतदान होना बाकी है. आगामी 23 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक व चुनाव विश्लेषक चुनाव परिणाम का पोस्टमार्टम करेंगे.

दरअसल, मुद्दे की बात यह है कि 2019 का लोकसभा चुनाव इस मायने में विशेष है क्योंकि देश की दो भिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि वाले सियासी दलों ने अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र के माध्यम से देश के दो सबसे बड़े वर्ग किसान और गरीब को एड्रेस करने की कोशिश की. घोषणा पत्र जारी होने के बाद यह लगा कि देर से ही सही कम से कम इन राजनीतिक दलों- कांग्रेस और भाजपा को इस तबके की सुध तो आई. लेकिन दोनों दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में गरीब लोगों और किसानों के लिए लोकलुभावन नारे और वादे तो थे, लेकिन यह वादे किस प्रकार पूरे किये जाएंगे इसका कोई ब्लू प्रिंट मौजूद नहीं था. अब तक देश के राज्यों और केंद्र के लिए अनेकों चुनाव संपन्न हो चुके हैं और हमारा अनुभव यहीं है कि राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र एक प्रकार से बिना जोखिम के पोस्ट डेटेड चेक की तरह ही होते है जो अक्सर बाउंस हो जाते हैं, और ऐसे फर्जी चेक जारीकर्ता के लिए किसी सजा का प्रावधान भी नहीं है।.

निराशा के माहौल के बीच भी किसानों को उम्मीद इस लिए जगी कि शायद इस बार राजनीतिक दलों की नियत वास्तव में कुछ कर गुजरने वाली हो, क्यों कि फिलवक्त हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में खास कर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसान लामबंद हो गये और इन तीनों राज्यों से वर्षों से सत्ता पर काबिज अपने को राष्ट्रवादी तथा विकास वादी कहलाने वाली पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. दिलचस्प बात यह रही कि इन राज्यों में सत्तारूढ़ सरकारों के पतन का श्रेय विपक्ष की रणनीतियों तथा मेहनत को नहीं दिया जा सकता. यह चुनाव सत्तारूढ़ सरकार तथा नाराज किसानों के बीच संपन्न हुआ. किसान स्पष्टतः विपक्ष की भूमिका में थे. इसके बाद लगा कि कांग्रेस किसानों के मुद्दों को लेकर अब ज्यादा गंभीर होगी, तो वहीं किसानों के बीच से अपने खिसके जनाधार को फिर से मजबूत करने के लिए भाजपा कमर कस कर चुनावी दंगल में ताल ठोकेगी. आरंभ में चुनावी घोषणा पत्र के माध्यम से संदेश तो यहीं निकला लेकिन जैसे-जैसे चुनावी माहौल गर्म होता गया, किसान और गरीबों के मुद्दे चुनाव प्रचार से गायब होते गये, और अनगर्ल आरोप प्रत्यारोप, जाति-संप्रदाय जैसे मुद्दे पुनः हावी होते गये. चुनाव के शुरू होते ही राजनीतिक दलों द्वारा मुद्दे बदलने का जबरदस्त खेल शुरू हुआ. विकास तथा राम मंदिर जैसे टिकाऊ मुद्दे कब और कहां दफन हो गए पता ही न चला. गरीबी-विकास, राम-रोटी-रोजगार, मंदिर-मस्जिद, हिंदू -मुस्लिम, सवर्ण- दलित, दलित-अति दलित, पिछड़ा- अतिपिछड़ा, अनुदान-आरक्षण जैसे मुद्दे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सीटों की वोटों के गणित के आधार पर ताश के पत्तों की तरह फेंटे जाते रहे. चौथे दौर में चुनाव के मुद्दे एकदम से बदल गए हैं अचानक चुनाव का ध्रुवीकरण अलग-अलग विचारधाराओं पर करने की कोशिश की जाने लगी है, और यह कोशिश सफल होती हुई भी दिखी. उदाहरण स्वरूप भोपाल की सीट पर हो रही चुनावी लड़ाई दरअसल दो विपरीत विचारधाराओं की लड़ाई बना दी गई है‌. इस देश के लिए सारे जरूरी मुद्दे अचानक इस चुनाव में बेमानी हो चले. चुनाव जीत कर देश में शासन करने का ख्वाब देख रही पार्टियों के लिए, देश की घटती हुई विकास दर तथा दिन प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी, आईसीयू में पड़ी खेती तथा आत्महत्या कर रहे किसान, अब चुनावी मुद्द नहीं रहे. जबकि अपने घोषणापत्रों में किसी पार्टी ने पहली बार साठ साल से ऊपर के किसानों को मासिक पेंशन देने की पेशकश की तो किसी पार्टी ने किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण देने का लुभावना प्रस्ताव रखा.

हालांकि यह कटु सत्य है कि, लगभग सभी पार्टियां जाति वार वोटों की संख्या के आधार और गणितीय फार्मूलों से प्रत्याशी चयनित करती रही हैं लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी सभा में अपनी जाति बताकर, सजातीय मतदाताओं से अपनी पार्टी के लिए वोट मांगना देशवासियों को निराश कर गया, क्योंकि इनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. पर यह हम सबको यह भी बताता है कि इस चुनाव में जितने प्रासंगिक मुद्दे हो सकते थे वह सब मुद्दे नेपथ्य में चले गए. बहुत उम्मीद थी किसान संगठनों को, जिन्होंने पिछले 5 वर्ष कड़ी मेहनत करके भारत की खेती-किसानी तथा किसानों की ज्वलंत मुद्दों को राजनीतिक पार्टियों की घोषणा पत्रों में जगह दिलाने के लिए जद्दोजहद की थी, वह चुनाव में कहीं भी प्रत्याशियों अथवा प्रमुख राजनीतिक पार्टियों द्वारा किसान अथवा किसानों के मुद्दे को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं की जा रही है. इससे साफ जाहिर है कि इस चुनाव में राजनीतिक पार्टियों ने देश की खेती तथा किसानों की समस्याओं को हाशिए पर डाल दिया है. इसका कारण यही हो सकता है कि राजनीतिक पार्टियां अभी भी इस मुगालते में हैं कि 5 साल भले किसान कितना भी आंदोलन कर लें, लेकिन चुनाव के वक्त, हमेशा की तरह इस बार भी यह सभी किसान संगठन तथा इनके सदस्य किसान अपने से संबंधित राजनैतिक पार्टियों तथा अपने सजातीय प्रत्याशियों को ही वोट देंगे. खेती तथा किसानों की बदहाली के कारण पिछले 5 सालों में किसान संगठन पूरे देश में सक्रिय रहे हैं, पूरे देश में किसानों ने लगातार आंदोलन किया है, लेकिन इन जबरदस्त आंदोलनों के बाद भी इनकी झोली खाली की खाली ही रही है. लेकिन इन आंदोलनों का एक लाभ अवश्य हुआ कि किसानों के मुद्दों को लगभग सभी पार्टियों के घोषणा-पत्रों में प्रमुखता से शामिल किया गया. किसानों ने इस चुनाव में जाति के आधार पर वोट दिया है अथवा अपने मुद्दों को प्राथमिकता देने वाली पार्टी के लिए एकमुश्त वोट किया है यह तो 23 मई को ही पता चलेगा.

दरअसल, देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां के किसानों के मुद्दे अलग-अलग हैं. नेता अलग-अलग हैं. बावजूद इसके एक बात साझा है, किसान अपनी समस्या और सरकारी उदासीनता और जुल्म से आक्रोशित है और नेता इन किसानों को अपने पाले में रख अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने में लगे हैं. देश की राजनीति में किसान हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहे हैं और राजनीति के केंद्र में भी, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा सबसे ठगा जाने वाला यहीं तबका है. देश में होने वाले चुनाव के मद्देनजर किसान राजनीति के केंद्र में आ गये हैं, मगर चुनाव बीत जाने के बाद हर बार की तरह बिसार दिये जाएंगे. चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार किसानों के मुद्दे हांसिए पर चले गये, इससे तो यही लगता है. चुनावी राजनीति के गणित को समझने की कोशिश करें तो शहरी क्षेत्र को छोड़ सभी लोकसभा सीट पर किसान निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो पाता कारण कि किसान जाति-संप्रदाय और दलगत राजनीतिक विचारधाराओं में बंटे हुए है.

हाल के दिनों में देखा जा रहा है कि सभी राजनीतिक दलों के नेताओं में खुद को किसान नेता साबित करने की होड़ लगी है. घटनाक्रमों और उसकी प्रतिक्रिया में बने माहौल को देख कर लगभग सभी राजनीतिक दल किसानों के समर्थन में बातें करते हैं चुनाव में इसे मुख्य मुद्दा मानते हैं लेकिन दूसरी ओर किसान संगठन या फिर किसानों के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल किसानों को लुभाने के लिए उनके हित की बात करने लगते हैं, वास्तव में उनकी नीयत ईमानदार नहीं होती.

यह साफ है कि राजनीतिक दल किसानों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. किसान एकजुट नहीं हैं. वे जाति और धर्म के नाम पर बंटे हुए हैं. राजनीतिक दलों ने उन्हें अपने फायदे के लिए बांट रखा है. देखा गया है कि आजादी के बाद से ही राजनीतिज्ञों के लिए किसान कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रहे हैं. जब चुनाव आता है तब ही उन्हें किसान याद आते हैं और वे खुद को किसानों का हितैषी दिखाने लगते हैं. अभी तक देश में जितने भी भूमि अधिग्रहण हुए हैं, वे सभी औद्योगिक विकास या फिर संरचनात्मक विकास के नाम पर हुए है. लेकिन देश में कितने नये उद्योग लगे यह आसानी से समझा जा सकता है.दिल्ली से सटे साहिबाबाद इलाके में सरकार ने उद्योग लगाने के नाम पर किसानों से जमीनें ली थी. अब उन जमीनों पर गगनचुंबी इमारते खड़ी हैं, औद्योगिक इकाइयों का कहीं कोई पता नहीं है. सरकार, बिल्डर की मिलीभगत से वहां की जमीन दे कर किसान से मजदूर बने लोग स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. और ऐसा केवल दिल्ली में ही नहीं लगभग हर राज्य में हो रहा है।

वैसे तो किसानों ने कई बड़े आंदोलन कर सत्ता तंत्र को एक पैर पर खड़े होने को विवश किया लेकिन इस पर भी गौर करने वाली बात है कि पिछले कुछ सालों में एक भी ऐसा किसान आंदोलन नहीं हुआ जो सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर सके. अन्यथा किसी भी राजनीतिक दल में इतनी हिम्मत नहीं हो पाती कि लोकसभा जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में भी किसानों के मुद्दों को सिर्फ उठा कर रस्मअदायगी करें. क्या राजनीतिक दलों की प्राथमिकता येन- केन प्रकारेण सिर्फ वोट बटोरना भर रह गया है, उन्हें न देश के टिकाऊ विकास से मतलब है और ना ही देश के आवाम से. यह चुनाव तो यहीं संदेश दे रहा है.

लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय समन्वयक हैं

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