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हिन्दी दिवस पर डॉ. शीतला प्रसाद दुबे जी का विशेष लेख

14 सितम्बर से हिन्दी-दिवस के समारोह आरंभ हो जाएंगे। एक बार फिर से विश्व विद्यालयों,विद्यालय-महाविद्यालयों,राजभाषा विभागोंऔर सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा हिन्दी का गुणगान किया जाएगा।चारों ओर उत्सव के माहौल में सितम्बर माह को हिन्दी के हवाले कर दिया जाएगा,क्योंकि अक्तूबर से अगस्त तक तो अंग्रेजी के पुराने राग पर ही गाना है।खैर! इसके बारे में फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे ।

आज कुछ दूसरी बात ही मन-मस्तिष्क में आई है,वह है हम हिन्दी की रोटी खाने वालों का व्यवहार ।  हिन्दी को आजीविका के रूप में उपयोग करने वालों में अध्यापक, राजभाषा-कर्मी  और मीडिया से जुड़े हुए लोग शामिल हैं ।ये तीनों अपने-अपने कोणों से त्रिकोण का निर्माण करते हैं ।ऐसा त्रिकोण,जिनके कोण परस्पर मिले हुए दिखाई तो देते हैं परंतु मिले हुए रहते नहीं हैं ।अब अध्यापकों को ही ले लीजिए ।विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग  से संबद्ध विद्वान प्रोफेसर महाविद्यालयीन प्राध्यापकों को खुद से छोटा मानते हुए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं ।वे तर्क देते नहीं अघाते कि अनुसंधान कार्य  और स्नातकोत्तर कक्षाओं में व्याख्यान देने के साथ ही वे देश-दुनिया के तमाम स्थानोंपर  भाषणों के लिए दौरे पर रहते हैं ।ऐसे में खुद को छोटा बनाते हुए वे महाविद्यालयों से संबंधित कार्य करेंगे तो उनकी तौहीन होगी।यही नहीं जहाँ बुलाये जाते हैं ये,वहाँ भी समय से पहुँचने में ये अपमान समझते हैं ।पहुँचेंगे भी तो भाषण देकर तुरंत निकलने की कोशिश करते हैं ।ऐसा नहीं  करने से लोगों का भ्रम टूटने का ख़तरा बना रहता है कि स्वनामधन्य विद्वान व्यस्त नहीं हैं ।

यही स्थिति महाविद्यालय के प्राध्यापकों की भी है।वे कनिष्ठ महाविद्यालय के हिन्दी प्रवक्ताओं के बीच अपनी उच्चता साबित करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते ।प्राथमिक स्तर पर बच्चों को शिक्षित करने वाले शिक्षकों पर भी उपरोक्त क्रम में ही लोगों का ध्यान जाता है।मैंने कभी किसी मित्र से ” हाय राम पाण्डेय में भी पाण्डेय ” की कहावत सुनी थी।शिक्षक पेशे में इसे चरितार्थ होते देखता हूँ । राजभाषा कर्मियों के भी अलग ही किस्से हैं ।

केन्द्रीय सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के अधीनस्थ कार्यालयों-विभागों के अतिरिक्त राष्ट्रीयकृत बैंकों और विविध उपक्रमों में राजभाषा-विभाग हैं ।संभवतः  इनके अधिकार ,कार्य प्रणाली  और वेतनमान में  अंतर हो सकता है । इनकी कार्यान्वयन समितियाँ अलग-अलग हैं  अतः निर्देश देने तथा समन्वयक अधिकारी भी अलग हैं ।इन सबके  आधार पर ये अपनी स्थिति को आंकते हैं ।कहने का तात्पर्य यह है कि राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन के बजाय इनका ध्यान अपनी स्थिति पर अधिक रहता है।इस पर भी तुर्रा यह कि गृह मंत्रालय ने क्षेत्रीय आधार पर राजभाषा  उपनिवेशकों की नियुक्तियाँ की है,जिससे कार्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जा सके।परंतु अधिकतर उपनिदेशक कार्यालयों का दौरा अपनी सुविधा और गिफ्ट पैकेट को ध्यान में रखकर करते हैं ।मैंने तो यहाँ तक सुना है कि दौरे के पूर्व यहाँ तक सुनिश्चित कर लिया जाता है कि उनके लिए क्या व्यवस्था की गई है?

कहने का तात्पर्य यह कि एक दृश्य-अदृश्य दबाव बना रहता है राजभाषा से जुड़े  अधिकारियों पर।राजभाषा के प्रयोग को लेकर नहीं, अन्य मुद्दों पर ।पत्रकारों और मीडिया कर्मियों में भी खुद को बाँट कर देखने का रिवाज है ।बड़े मीडिया घरानों और छोटे अखबारों में हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े लोगों में भी इसी तरह की वर्गीय मानसिकता कार्य करती है।तुर्रा यह कि ये व्यावसायिक दबाव के कारण घोषित तौर पर कहने से बाज नहीं आते कि उनका काम भाषा-पोषण का नहीं बल्कि खबरें परोसने का है।लघु पत्र-पत्रिकाएँ, जो भाषाई आग्रह को लेकर संचेतना फैलाने का कार्य कर रही हैं,वे आंकड़ों की दुनिया में बहुत पीछे हैं ।मैं  इनके आंतरिक मामलों में  अधिक नहीं  जाते हुए यह कहना चाहता हूँ कि इन तीनों में यदि समन्वय  और कोआर्डिनेशन के स्तर पर परस्पर  सहभागिता की भावना हो तो हिन्दी-भाषा के विकास तथा प्रसार की राह खुल सकती है।अपनी-अपनी डफली,अपना-अपना राग तलाशने के बजाय विषयगत कार्य के प्रति  प्रतिबद्धता के साथ भाषा माध्यम के मार्ग को महामार्ग बनाया जा सकता है, लेकिन सबसे पहले हम हिन्दी की खाने वालों को एक साथ आना होगा।

दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो–“मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता ।हम घर में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे?” आवश्यकता  है इस भटकन से मुक्ति पाने की।इन तीनों को साथ में आकर रचनाकारों से सहृदयी होना होगा।पहले आपस में  एक हों और फिर छिद्रान्वेषण करने के बजाय परस्पर संवाद करने की स्थिति पैदा करें ।बिना संवाद के हम सब अलग-अलग किसी वीराने में खड़े होकर अपना राग अलापते रहेंगे और वहीं खड़े रहेंगे जहाँ से शुरू किया  था।मैं पहल करने के लिए तैयार हूँ , क्या आप से भी यही उम्मीद रखूँ।

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