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अंधविश्वास फैलाते टीवी सीरियल और कानून की लाचारी  

डॉ. कनक लता तिवारी

आज मैं टीवी सेरिअल्स के बारे में बोलना चाहती हूँ जो समाज में अंधविश्वास की जड़ें जमा रहे हैं .हमारे पूर्वजों ने अंधविश्वास के विरुद्ध जो लड़ाई लड़ी वह अब बेकार हो रही है क्योंकि टीवी एक विसुअलमाँध्यम है और आँखों देखी का प्रभाव  आप पर ज्यादा पड़ता है . आज के इस मॉडर्न एवं टेक्नोलॉजी भरे युग में ऐसी अंधविश्वासी चीज़ें लोगों को पीछे धकेल रहे हैं  , जो कि एकदम गलत है। सीरियल मानो आज के युग में मानो एक चुम्बक  का कार्य कर रहा है। जो खुद ब खुद लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। अंधविश्वासों से टीवी सीरियलों द्वारा फैलाए जा रहे जाल में लोग फंसते जा रहे हैं। खासकर महिलाओं को सीरियल देखना बेहद पसंद हैं। इसके साथ साथ घर पर रह रहे बच्चे भी सीरियल से मनोरंजन का लुत्फ़ उठाते हैं और वह इन अंधविश्वासी और अजीबोगरीब घटनाओं को सच भी मान लेते हैं , जो उनके जीवन पर गलत प्रभाव डालती है। बच्चों और महिला दर्शकों की अधिक संख्या के चलते ही टीवी चैनलों पर ऐसे सीरियल  की लाइन लग गई है।कयामत की रात और  नागिन 3 जैसे सेरिअल्स की बढ़ती TRP के चलते बाकी प्रोग्राम बनाने वाले इसी तरफ खिंच रहे हैं । इन सीरियल्स को देख कर लगता है कि अंधविश्वास पिछड़े और अनपढ़ लोगों में ही नहीं होता, बल्कि बढ़िया पढ़े लिखे लोगों पर भी मानसिक रोग अपनी चपेट में ले रहा है। इस तरह के सीरियल देखकर हर कोई अब चाहे वो बड़े हो या छोटे उनके मन में ये सभी घटनाएं स्थाई रूप से जमा हो जाती है। आज के दौर में लगभग हर छोटा बड़ा चैनल अपने दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर अंधविश्वास परोस कर दे रहा है।

विश्व भर में भारत के वैज्ञानिकों की एक खास पहचान है. लेकिन हमारे टीवी सीरियल आज भी जादूटोना और भूतप्रेतों से बाहर नहीं निकल पा रहे. 1988 में आए एक टीवी सीरियल ‘होनीअनहोनी’ को डीडी चैनल पर प्रसारित करने पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि इस में अंधविश्वास, भूतप्रेत जैसे कंटैंट दिखाए जा रहे थे. हालांकि बाद में कोर्ट ने इसे प्रसारित करने के आदेश दे दिए थे. ब्रौडकास्टिंगकंटैंटकंप्लेंट काउंसिल यानी बीसीसीसी पहले ही इस तरह के कंटैंट को प्रसारित करने वाले चैनलों को ऐडवाइजरी जारी कर चुका है और पिछले दिनों भी इस के चेयरमैन मुकुल मृदुल ने एक निर्देश जारी किया था, जिस के अनुसार बीते दिनों में काउंसिल को टीवी शोज में डायन, चुड़ैल, जादूटोना, अंधविश्वास जैसे सीन खासतौर पर महिलाओं को नैगेटिव रूप में अधिक दिखाए जाने की शिकायतें बहुत मिली हैं, इसलिए इन्हें बढ़ाचढ़ा कर न दिखाया जाए, साथ ही अगर स्टोरी लाइन के लिहाज से यह आवश्यक हो तो चैनल को टैलीकास्ट करते समय स्क्रोल चलाना होगा कि यह सब काल्पनिक है. फिर भी सवाल यह उठता है कि क्या बीसीसीसी केवल तभी कोई कदम उठाता है जब कोई शिकायत दर्ज हो? क्या खुद उस की नजर इन पर नहीं पड़ती?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सभी को बोलने और अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन क्रिएटिवफ्रीडम के नाम पर कुछ भी दिखाने पर रोक लगनी ही चाहिए और विशेषकर तब जब मामला आने वाली पीढ़ी यानी कि बच्चों से जुड़ा हो. साथ ही गृहिणियों को भी अपना कीमती समय इन धारावाहिकों को देखने में बरबाद न कर कुछ रचनात्मक करना चाहिए. अपने बच्चों के लिए भी यह उन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे खुद भी अंधविश्वासों से दूर रहें और उन्हें भी दूर रखें. अच्छे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक सीरियल ही देखें.

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