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जीवन के उच्च आदर्श

 अजीत कुमार राय

जब कभी हम जीवन के उच्च आदर्श के बारे सोचते हैं, तो हमारे मनमस्तिष्क में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं विनोबा भावे जैसे महापुरूषों के व्यक्तित्व उभरकर सामने आते हैं, जिन्होंने न केवल अपने जीवन में आदर्शों को पूरी निष्ठा के साथ जिया, अपितु औरों के लिए भी आदर्श बने। आदर्श का अभिप्राय सर्व हितकारी और सर्व स्वीकार्य से होता है। समाज के चहुंमुखी विकास के लिए सर्व हितकारी नीतियों की हमेशा से वकालत की जाती रही है। समाज व्यक्ति से ही बनता है। ऐसे में जीवन के उच्च आदर्श समाज के लिए चिह्नित आदर्श से भिन्न नहीं हो सकते। एक सामाजिक प्राणी के रूप में व्यक्ति के वैयक्तिक कर्तव्यों को हम जीवन के उच्च आदर्श का पैमाना मान सकते हैं। कर्तव्य का यथार्थ स्वरूप सेवा बताया गया है, जिससे हमेशा दूसरों का हित होता है।


आदर्श के मानक स्थापित करने में सबसे बड़ी भूमिका उद्देश्य की होती है। जैसा उद्देश्य होता है, उसके अनुसार परिणाम होता है। यदि आत्मकल्याण का उद्देश्य हो, तो व्यक्ति में कर्तव्य बोध स्वत: ही आने लगता है। कर्तव्य बोध से प्रे्ररित व्यवहार ही उच्च आदर्श के रूप में परिभाषित हैं। दुनिया में जितने भी महापुरुष हुए हैं, सभी ने अपने जीवन में साहस, प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, सहनशीलता, लगनशीलता और संवेदनशीलता जैसे भावों को आत्मसात कर ही इतिहास में अपना एक मुकाम बनाया है। अपनी उपलब्धि तक पहुंचने के सफर के दौरान उन्होंने जिस आचरण के उदाहरण प्रस्तुत किए, वे आदर्श के तत्व ही हैं।


जीवन में आदर्श निर्माण की एक सतत लंबी प्रक्रिया है। यह एक दिन, एक माह या एक साल में पूरा होने वाला कार्य नहीं है। हां प्रत्येक दिन की हर सोच और कार्य इसका हिस्सा जरूर होते हैं। दूसरे शब्दों में इसे व्यक्तित्व निर्माण भी कह सकते हैं। इसको संवारने में काफी हद तक देश, काल और परिस्थितियों का प्रमुख योगदान रहता है। किस समय और किस परिस्थिति में कोई व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है, इसी से उसके जीवनमूल्य की दिशा तय होती है। कहावत है, शांत समुद्र में कोई सफल नाविक नहीं बन सकता। जीवन में आदर्श के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है। मुख्यतया आदर्शों की पहचान विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी सर्वहित को प्राथमिकता देने वाले कार्य ही आदर्श की श्रेणी मेें आते हैं। जीवन मूल्य परिस्थिति और समय के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से सेवा दया, त्याग और सहनशीलता जीवन मूल्य समझे जाते हैं, किन्तु यही सिद्धांत दो देशों के बीच युद्धकाल के दौरान लागू नहीं किए जा सकते। उस स्थिति में कर्तव्य परायणता सबसे बड़ा जीवन मूल्य हो जाती है।


भले ही आदर्श की परिभाषा में विशाल परिप्रेक्ष्य आता है, लेकिन क्षेत्र विशेष के संदर्भ में एक तरह से देखा जाए तो संस्कार शब्द भी आदर्श के ही अंतर्गत भावों को व्यक्त करता है। संस्कार के तहत भी हमें वही बातें सिखाई-पढ़ाई जाती हैं, जो आदर्श के मापदंड होते हैं। संस्कारों की आधारशिला बचपन में ही माता पिता घर के वातावरण में रख देते हैं। घर में मिले संस्कार काफी हद तक व्यक्ति से जीवन पर्यंत जुड़े रहते हैं। संस्कारों के तहत ही मर्यादाओं को जीवन पद्धति से जोड़ा गया है। जिसका ज्ञान घर, स्कूल, कॉलेज और समाज से मिलता रहता है।
व्यक्ति के खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा तथा उत्सव सभी कार्य उसके संस्कारों के अनुसार होते हैं। संचार क्रांति के बाद संस्कारों के क्षेत्र में काफी मिश्रण हो रहा है। सोशल मीडिया और सेटेलाइट चैनलों के आने के बाद भिन्न भिन्न संस्कृतियों के लोग आमने-सामने आ गए हैं। इससे अलग-अलग संस्कृतियों के संस्कार एक दूसरे क्षेत्र के संस्कारों को प्रभावित कर रहे हैं। इसका परिणाम अंधानुकरण के बढ़ावे के रूप में आता है। ऐसे में दिशा हीनता का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है और दिशाहीनता लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा होती है। संस्कारों के घालमेल का ही असर है कि लोगों को कहते सुना जा रहा है कि आज के जमाने में आदर्शवाद की लकीर पर चल पाना बहुत मुश्किल है। आज के भौतिकवादी युग के चकाचौंध में तिकड़मबाजी के सहारे कोई छोटी मोटी उपलब्धि भले ही हासिल कर ले, लेकिन वह उपलब्धि रेत पर बने घरौंदे की तरह ही होती है, जिसे हवा का एक झोंका तहस नहस कर देता है। सम्मानित परिवार, समाज, संस्था और राष्ट्र के चरित्र का मूल आधार उच्च आदर्श ही होते हैं।


सत्य को जीवन का सबसे बड़ा आदर्श माना गया है, क्योंकि ताकत और सुख के अहसास सदैव इसके साथ रहते हैं। सत्यता के बगैर जीवन के उच्च आदर्शों की व्याख्या पूरी नहीं हो सकती। सच्चाई का दामन छोड़ जब मनुष्य झूठ, फरेब का सहारा लेने लगता है तब उसे समय-समय पर अपराध बोध, पश्चाताप और अपमान के दौर से गुजरना पड़ता है। इसके विपरीत सत्य का अनुसरण करने से निर्भयता और आत्मविश्वास जैसे भाव अपने आप आ जाते हैं। ओशो ने सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा है, सत्य का कोई पक्ष नहीं है, इसलिए जो निष्पक्ष होता है, पक्ष शून्य होता है, वह सत्य की ओर जाता है और सत्य उसका हो जाता है। चित्त को उस स्थिति में ले चलो, जहां सभी पक्ष अनुपस्थित हैं। उसी बिंदु पर विचार मिटता है और दर्शन प्रारंभ होता है। आंखें जब पक्ष मुक्त होती हैं, तो वे च्जो हैंज् उसे वास्तविक रूप में देखने में समर्थ हो जाती हैं। सत्य की ओर प्रसिद्धि खिंची चली आती है।


जीवन के उच्च आदर्शों की सबसे ज्यादा प्रासंगिकता व्यक्ति की जीवन शैली के संदर्भ में ही है। अपनी जीवन शैली की तटस्थ समीक्षा और ईमानदारी से विश्लेषण कर उसमें अपेक्षित सुधार करने के बाद ही एक आदर्श जीवन शैली अपनाई जा सकती है। आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में सबसे बड़ी चुनौती एक आदर्श जीवन शैली को बनाए रखना ही है। जीवन शैली जीवन जीने की एक कला है, अपने स्वास्थ्य के प्रति एक जागरूकता है और अपने समय का सुव्यवस्थित प्रबंधन कर उसकी निरंतर पालना है। एक सफल और एक असफल व्यक्ति की बुद्धि और सोच में जैसे काफी अंतर होता है। उसी प्रकार दोनों की जीवन शैली में बहुत विषमताएं दिखती हैं। सफल लोगों की आदर्श जीवन शैली ही है, जो उन्हें आम लोगों से अलग खास व्यक्तित्व के रूप में समाज में प्रतिष्ठा दिलाती हैं। यही कारण है प्राचीन काल से लेकर अब तक भारतीय शास्त्रों, यहां के ऋषि-मुनियों और संतों ने सबसे अधिक प्रधानता एक आदर्श जीवन शैली के निर्माण को ही दी। आदर्श जीवन शैली के निर्माण के लिए भारतीय मनीषियों ने संयम, करुणा, मैत्री, सहिष्णुता, सहयोग की भावना, नीति निष्ठा, परोपकार, आत्मानुशासन, नशामुक्ति, व्यसनमुक्ति, मितव्ययिता, कर्तव्यनिष्ठा, व्यवस्था के प्रति जागरूकता और विनम्रता आदि मूल्यों को आत्मसात करने पर बल दिया है। 
व्यक्ति की जीवन शैली उसकी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और वातावरण से निर्धारित होती है। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व देखकर उसकी जीवन शैली का आंकलन भी किया जा सकता है। भोगपरक जीवन शैली में आदर्शवाद असंभव तो नहीं, किंतु मुश्किल जरूर है। हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति और सभ्यता में हमारे मनीषियों और महापुरुषों ने आदर्श जीवन के जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, उनका अनुकरण आज तक होता आ रहा है। आदर्श जीवन के सबसे आदर्श प्रतीक भगवान राम को माना जाता है। श्रीराम ने पारिवारिक और सांसारिक जीवन में आदर्श और व्यवहार की एक मिसाल प्रस्तुत की है। जो हर युग, हर क्षेत्र में सामंजस्यता का अचूक मंत्र माना गया है। श्रीराम ने अपने जीवन काल में माता-पिता, गुरु, भाई, मित्र और समाज के प्रति प्रेम, आदर, स्नेह, त्याग, सहयोग, सहानुभूति और उदारता की जो परिभाषा अपने व्यवहार और विचारों से दी, उसकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी। वर्तमान संदर्भों में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों का जनमानस पर गहरा प्रभाव है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, उनसे उत्तम कोई व्रती नहीं, कोई श्रेष्ठ योगी नहीं। उनके महान चरित्र की उच्च वृत्तियाँ जनमानस को शांति और आनंद उपलब्ध कराती हैं।


संपूर्ण भारतीय समाज के जरिए एक समान आदर्श के रूप में भगवान श्रीराम को उत्तर से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण जनमानस ने स्वीकार किया है। उनका तेजस्वी एवं पराक्रमी स्वरूप भारत की एकता का प्रत्यक्ष चित्र उपस्थित करता है। आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। राम के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के दर्शन होते हैं। राम ने साक्षात परमात्मा होकर भी मानव जाति को मानवता का संदेश दिया। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है। इसीलिए तो भगवान राम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा। राम के आदर्श लक्ष्मण रेखा की उस मर्यादा के समान है जो लांघी तो अनर्थ ही अनर्थ और सीमा की मर्यादा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। परिदृश्य अतीत का हो या वर्तमान का, जनमानस ने रामजी के आदर्शों को खूब समझा-परखा है। बाल्मिकी कृत सुप्रसिद्ध ग्रंथ रामायण को आदर्श जीवन का महाकाव्य कहा जाए तो, अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस महाकाव्य में उन्होंने भिन्न-भिन्न नायकों के चरित्र चित्रण से आदर्श जीवन एवं नैतिकता का बड़ा  ही सहज एवं सजीव चित्रण किया है। अपने पिता महाराज दशरथ के वचन को अपना ध्येय मान राम का सहर्ष वन चले जाने का प्रसंग पितृभक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है, तो भरत द्वारा राम की चरण पादुका को सिंहासनारूढ़ कर खुद सेवक बन राज्यकार्य देखने का प्रसंग आदर्श भातृभक्त का उदाहरण है। इतना ही नहीं रामायण में जीवन को आदर्शोंन्मुखी बनाने के लिए अवगुणों से मुक्त रहने पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। रावण का व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए महर्षि बाल्मिकी ने अहंकार को आदर्श जीवन में सबसे बड़ा बाधक बताया है। अहंकार के चलते ही रावण जैसा प्रकांड विद्वान, महान शिवभक्त, पराक्रमी एवं बलशाली सम्राट उस मान सम्मान को प्राप्त नहीं कर पाता है, जिसका वह हकदार है और आज भी उसका जिक्र एक नकारात्मक व्यक्तित्व के रूप में किया जाता है। यदि हम बात पारिवारिक सौहाद्र्ध एवं प्रेम की करें, तो भारत में परंपरा से चली आ रही सभ्यता का ही असर है कि माता-पिता का जितना सम्मान भारत में किया जाता है, उतना दुनिया के किसी भी अन्य देश में इसके उदाहरण नहीं मिलते। रामायण काल में श्रवणकुमार एवं महाभारत काल में भीष्म पितामह इसके जीवंत उदाहरण हंै। श्रवण कुमार जहां अपने माता-पिता को अपने कंधे पर लेकर चार धाम की यात्रा कराते है, तो वहीं भीष्म पितामह अपने पिता महाराज शांतनु के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने एवं राजपद का परित्याग करने का प्रण कर लेते है।
हमारी संस्कृति में चरित्र की सात्विकता को आदर्श जीवन का मूल आधार माना गया है। भारत में परिवार, स्कूल, गुरुकुल, समाज हर जगह प्रत्येक परिस्थिति में चरित्र की उज्ज्वलता बरकरार रखने की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है। भगवान राम पूरी दुनिया में आदर्श चरित्र के सबसे बड़े प्रतिमान हैं। बिना अच्छे चरित्र के कोई भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सम्मान नहीं प्राप्त कर सकता। आदर्श चरित्र एक मजबूत सुरक्षा कवच होता है, जो कभी साथ नहीं छोड़ता। हर परिस्थिति में व्यक्ति की रक्षा करता है। पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक सभी प्रकार की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना हम अच्छे चरित्र के बल पर कर सकते हैं।


आचार्य विनोबा भावे की सफलता में सबसे बड़ा योगदान उनकी सद्भावना का रहा । आचार्य भावे के व्यक्तित्व का सद्भावना पक्ष ही था, जिसकी निर्मलता से आकर्षित होकर हजारों भू-स्वामियों ने उनके भूदान आंदोलन में भाग  लिया और अपनी जमीनें जरूरतमंदों के रहने के लिए दान कर दी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सत्य, अहिंसा, त्याग और तपस्या के महाप्रतिपादक थे। गाँधी जी के अनुसार ‘अहिंसा’ का अर्थ किसी जीव को केवल शारीरिक कष्ट पहुँचाना नहीं है। बल्कि, मन एवं वाणी द्वारा भी किसी को कष्ट न पहुँचाना भी ‘अहिंसा’ की श्रेणी में आता है। इसका मतलब, किसी को मारना अथवा पीटना ही नहीं, अपितु यदि किसी को मानसिक अथवा जुबानी तौरपर भी आहत किया जाता है, वह भी ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। गाँधी जी कहते थे कि अहिंसा का अर्थ बुराई के बदले, भलाई करना और नफरत के बदले प्रेम करना है। उनका स्पष्ट तौरपर कहना था कि ‘अहिंसा’ का मतलब ‘कायरता’ बिल्कुल भी नहीं है। गाँधी जी किसी के उपकार के प्रति कृतज्ञता बरतने की बड़ी नेक सलाह देते थे। उनका कहना था कि उपकार करने वाले के प्रति तो मन, वाणी और कर्म से दस गुणा उपकार करना ही चाहिए। इसके अलावा जग में सच्चा और सार्थक जीवन उसी का है, जो अपकार करने वाले के प्रति भी उपकार करता है।’’ निश्चित तौर पर गांधी जी के ये सिद्धान्त एक आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण में बेहद अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।


महात्मा गाँधी जी सहनशीलता के गुण को आत्मसात करने पर बेहद जोर देते थे। उनका मानना था कि इस दुनिया में जितनी भी समस्यायें, ईष्र्या, द्वेष, संकीर्णता जैसी अनेक दुर्भावनायें भरी पड़ी हैं, उन सबका मूल कारण कहीं न कहीं असहनशीलता है।  जीवन में सफलता हासिल करने और उसके बरकरार रखने में चरित्र की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे लोगों के कई उदाहरण भरे पड़े हैं, जो अपने क्षेत्र में सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचने के बाद सिर्फ अपनी चारित्रिक दुर्बलता के कारण अवनति के शिकार हो गए। लोगों के सामाजिक जीवन में लोक व्यवहार को  लेकर अक्सर देखा गया है कि सभी इस माथापच्ची में ज्यादा रहते है कि, च्लोग क्या कहेंगे।ज् वे अपने व्यक्तित्व के नकारात्मक पक्षों को छुपाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं, तो दूसरी ओर समाज में मान सम्मान पाने के लिए अपनी खूबियां प्रदर्शित करने के मौके तलाशते रहते हैं, कभी अपने कार्यों द्वारा, तो कभी किसी घटना या परिस्थिति पर विचार व्यक्त करके। इस तरह से वे काफी मूल्यवान समय अपने अवगुणों पर पर्दा डालने में बर्बाद करते हैं। इन बुरी आदतों से छुटकारा पाने का सबसे आसान उपाय है जीवन के उच्च आदर्श के सिद्धांतों की पालना। आदर्श के सिद्धांत दुर्गुणों को ढकने में लगने वाले समय और उर्जा की बर्बादी से निजात दिला सकते हैं। अपने व्यवहारिक जीवन में आदर्श के सिद्धांत अंगीकार करने से सबसे पहले सामाजिक जीवन के सबसे बड़े रोग च्क्या कहेंगे लोगज् की कशमश से मुक्ति मिल जाएगी। क्योंकि जैसे दीपक के जलते ही अंधेरे का अस्तित्व नहीं रहता, ठीक उसी तरह जब आदर्श जीवन के सिद्धांत आचरण का हिस्सा बन जाते हंै, तब व्यक्तित्व में किन्ही बुरे पहलू की गुंजाइश नहीं रहती और कुछ छुपाने की जद्दोजहद में अतिरिक्त सावधानी भी नहीं बरतनी पड़ती।

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