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”मैं और चार्ल्स ”

निर्देशक – प्रवाल रमण
कलाकार – रणदीप हुड्डा, आदिल शाह, ऋचा चड्ढा, तिस्का चोपड़ा
स्टार – ढाई
निर्देशक प्रवाल रमण ने ‘मैं और चार्ल्स ” को कई नज़रिये से दिखाया है।  एक नजरिया पुलिस अधिकारी आमोद कांत का है, जो उसे हर हाल में अपराधी मानता है, दूसरा नजरिया उन लोगों का है, जो उसके सम्मोहक व्यक्तित्व का मुरीद हो उसकी चर्चा करते हैं और तीसरा नजरिया उनका हैं, चार्ल्स शोभराज को बचपन में उपेक्षा और अभाव का परिणाम मानते हैं। दुनिया के लिए अजूबे व्यक्ति को पर्दे पर दिखाने में शोध सम्बन्धी कई कमियां रह गयी हैं। यद्यपि प्रवाल ने चार्ल्स के जेल में होने, भागने और फिर पकड़े जाने तक की कहानी दिखाई है, लेकिन उसमें भी चार्ल्स का व्यक्तित्व तर्क संगत नहीं लगता।
थाईलैंड में हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाया चार्ल्स(रणनदीप हुड्डा) भाग कर भारत आया है। वह विदेशी महिलाओं को अपने सम्मोहक व्यक्तित्व से प्रभावित कर पहले उनके साथ सोता है और फिर हत्या कर उनका पासपोर्ट अपने पास रख लेता है। पासपोर्ट के जरिये वह हर बार अपनी पहचान बदल लेता है। पुलिस बड़ी मुश्किल से उसे गिरफ्तार कर लेती दिल्ली के तिहाड़ जेल में रखती है। लेकिन वो तमाम पुलिस वालों को बेहोश कर जेल से फरार हो मुंबई आ जाता है और पुलिस से बचते गोवा पहुंचता है। गोआ के ड्रग्स और सेक्स के माहौल में चार्ल्स आसानी से अपने इरादे में कामयाब होता है। पुलिस ऑफिसर अमोद कांत चार्ल्स के पीछे लगा हुआ है।
पुलिस और अपराधी के बीच कश्मकश को दिखती ”मैं और चार्ल्स ” बहुत धीमी गति से बिना मारपीट  और बिना लच्छेदार डॉगलागबाजी से आगे बढाती है। फिल्म में दिलचस्पी का प्रमुख कारण रणदीप हुड्डा हैं, वे जब भी दिखाते हैं उत्सुकता बढ़ जाती हैं।
फिल्म प्रारम्भ में बिना संवादों के केवल दृश्यों के सहारे आगे बढाती है। शुरू का वातावरण दिखाने के क्रम में दृश्य परिवर्तन माहौल समझने में कन्फ्यूज करते हैं। मध्यांतर से पहले थोड़ी देर के लिए फिल्म भटकी हुई लगती है, जो बोझिल लगता है। दूसरे हाफ में ध्यान खींचती है। इसका कारण कलाकारों का जिवंत अभिनय है।  खासकर रणदीप हुड्डा तो लाजवाब लगे हैं। बॉडी लैंग्वेज, संवाद अदायगी और मुस्कराहट में वे पूरे ठसक के साथ चार्ल्स शोभराज के करिश्माई व्यक्तित्व को पर्दे पर दिखा दिए हैं। कहानी के दूसरे पक्ष अमोद कांत  को आदिल शाह ने हल्का नहीं होने दिया है। छोटे रोल में भी ऋचा चड्ढा और तिस्का चोपड़ा अपनी छाप छोड़ गयी हैं। एक – दो गाने अच्छे हैं।

 

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